मैं हूँ कौन?

550.00

AUTHOR आचार्क डनलर्
ISBN 978-93-6422-024-8
Language English
Pages 202
Publication Year 2026
Binding Paperback
Publisher Addition Publisher
Category:

इस डकताब को जल्दी मत पढना।
इस ककताब को मैंने इस तरह कलखने की कोकिि की है कक जहााँ से भी इसे पढ़ना चाहो, तुम वहीीं से उसकी िुरुआत कर सकते हो।
र्ह उपन्मास नहीिं है डजसे एक रात में खत्म करना है। र्ह एक र्ार्त्ा है।
हर अध्यार् के बाि रुको। डकताब बिंि करो। थोडा सोचो, थोडा महसूस करो। अगर कोई बात अिंिर तक उतर जाए, तो उसी बात के साथ कुछ िेर बैठो। और डिर अगला अध्यार् शुरू करो।
इस डकताब में जो भी तरीके बताए गए हैं, वो डस़िक सीडढर्ााँ हैं। उन्ें मिंडजल मत समझ लेना।
भाग 1- में हम वो सारे मुखौटे उतारेंगे जो तुमने पहन रखे हैं। सोशल मीडिर्ा का मुखौटा, कररर्र का मुखौटा, ररश्ोिं का मुखौटा, शरीर का मुखौटा, और मन का मुखौटा।
भाग 2- में हम िेखेंगे डक इडतहास के सबसे बडे सिंतोिं और िाशकडनकोिं ने इसी सवाल पर क्या कहा। रमण महडिक से लेकर कृष्ण तक, बुद्ध से लेकर कबीर तक, सुकरात से लेकर सार्त्क तक।
भाग 3- में हम डवज्ञान की िुडनर्ा में जाएाँगे। न्मूरोसाइिंस, क्ािंटम ड़िडजक्स, ए.आई.और िेखेंगे डक आर्ुडनक डवज्ञान चेतना के बारे में क्या कहता है, और क्या नहीिं कह पाता।

भाग 4- में असली काम शुरू होगा। आत्म-पूछताछ कैसे करें, सािी भाव क्या है, ईगो के खेल कैसे पहचानें, और वो सात डिन का प्रर्ोग जो तुम्सारी डजिंिगी बिल सकता है।
भाग 5- में वो बचता है जो सब डगर जाने के बाि बचता है। तो चलो, शुरू करते हैं। अपने सबसे र्करीबी िुश्मन से अपनी नर्कली पहचान से।

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